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क्या नेपाल की कमान संभाल सकते हैं बालेन शाह?

 

काठमांडू:
नेपाल की राजनीति में इस समय सबसे ज्यादा जिस नाम की चर्चा हो रही है, वह है बालेन शाह। काठमांडू के मेयर के तौर पर उभरे यह चेहरा आज युवाओं के बीच उम्मीद और बदलाव का प्रतीक बन चुका है। सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में बालेन शाह नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में भी “कमान” संभाल सकते हैं?

कौन हैं बालेन शाह?

बालेन शाह का जन्म 1990 में काठमांडू में हुआ। वे सिविल इंजीनियर हैं और रैपर के तौर पर भी उनकी पहचान रही है। 2022 में उन्होंने बिना किसी बड़े राजनीतिक दल के समर्थन के स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में काठमांडू महानगरपालिका का चुनाव जीता। यह जीत पारंपरिक दलों के खिलाफ जनता की नाराज़गी और युवाओं के गुस्से की बड़ी अभिव्यक्ति मानी गई।

मेयर के तौर पर छवि

बालेन ने मेयर बनने के बाद कई मुद्दों पर सख्त और साहसिक कदम उठाए।

कचरा प्रबंधन और अवैध निर्माण हटाने पर उनका जोर रहा।

उन्होंने पारदर्शिता और जवाबदेही को प्राथमिकता दी।

हालांकि सड़क किनारे छोटे कारोबारियों पर कार्रवाई और कठोर रवैये को लेकर वे विवादों में भी रहे।

युवाओं और सोशल मीडिया पर उनकी छवि मजबूत बनी हुई है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि स्थानीय स्तर के फैसले और राष्ट्रीय राजनीति की चुनौतियाँ अलग हैं।

क्या प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना संभव है?

नेपाल के संविधान के मुताबिक प्रधानमंत्री बनने के लिए संघीय संसद में बहुमत या बड़े राजनीतिक दलों का समर्थन जरूरी है। मेयर का पद सीधे-सीधे इस रास्ते को नहीं खोलता।

संभावनाएँ:

1. बालेन शाह अगर राष्ट्रीय चुनाव लड़ते हैं और संसदीय सीट जीतते हैं, तो धीरे-धीरे वे अपनी पार्टी या संगठन खड़ा कर सकते हैं।

2. मौजूदा संकट और पारंपरिक दलों से जनता की नाराज़गी उन्हें एक वैकल्पिक चेहरा बना रही है।

3. असामान्य परिस्थितियों में, अगर संसद में शक्ति संतुलन बिगड़ा तो बड़े दल मिलकर उन्हें “कन्सेन्सस कैंडिडेट” भी बना सकते हैं।

 

चुनौतियाँ:

संसदीय राजनीति का अनुभव कम है।

राष्ट्रीय स्तर पर संगठन और समर्थन तंत्र अभी कमजोर है।

कठोर फैसले उनकी लोकप्रियता पर असर डाल सकते हैं।

 

निष्कर्ष

बालेन शाह की लोकप्रियता निर्विवाद है और युवाओं के बीच उनका जादू साफ दिखता है। लेकिन नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में “कमान” तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है। संसदीय राजनीति, गठबंधन की मजबूरियां और बड़े दलों की जमीनी पकड़ अब भी बड़ी बाधा हैं।

फिर भी, अगर नेपाल की जनता पारंपरिक राजनीति से और ज्यादा मोहभंग करती है और बालेन शाह अपने संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा कर लेते हैं, तो आने वाले समय में उनका नाम प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।

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