“जातिवाद बनाम विकास: चुनावी चर्चाओं में कौन भारी?”
बिहार की राजनीति को देखकर अक्सर यही सवाल उठता है कि क्या इस राज्य का विकास कभी जातिवाद की दीवारों से मुक्त हो पाएगा? दशकों से चली आ रही राजनीति की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि आज भी विकास के असली मुद्दे — शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढाँचा — हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं।
आने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भी यही तस्वीर साफ नज़र आ रही है। जनता के बीच चर्चाओं में जातीय समीकरण और परिवारवाद तो मुख्य मुद्दे बन जाते हैं, लेकिन शिक्षा की गिरती स्थिति, युवाओं का पलायन, डॉक्टरों और अस्पतालों की कमी या उद्योगों की अनुपस्थिति जैसे सवाल कहीं खो जाते हैं।
हाल ही में डिजिटल मंचों पर हुए चर्चाओं और प्रवासी बिहारी लोगों के विचारों से भी यही झलकता है कि एक नया विकल्प बनने की संभावना होने के बावजूद समाज का बड़ा तबका इसे गंभीरता से नहीं लेना चाहता। कारण यही है कि लोग अब भी जातीय वफादारी में बंधे हुए हैं।
यह प्रवृत्ति बेहद चिंताजनक है। अगर जनता तीसरे विकल्प की ओर देखना ही नहीं चाहेगी, तो बिहार में नई राजनीतिक संस्कृति कैसे पनपेगी? विकास की राजनीति कैसे आगे बढ़ेगी? आज भी अगर हम अपने आसपास की चर्चाओं को देखें तो साफ महसूस होता है कि लोग जातीय पहचान को विकास से ज्यादा महत्व देते हैं।
बिहार का युवा वर्ग आज भी बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में बाहर जाने को मजबूर है। अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाली पीढ़ियों के लिए बिहार में रहकर बेहतर जीवन बनाने का सपना और दूर होता जाएगा।
इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि बिहार की जनता जातिवाद के दायरे से बाहर निकलकर सोचे। अगर हम सच में विकास चाहते हैं, तो हमें जातीय राजनीति की जंजीरों को तोड़कर शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे असली मुद्दों को प्राथमिकता देनी होगी।

