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मणिकर्णिका घाट पर 94 लिखने की परम्परा: जीवन और मृत्यु का अनोखा रहस्य

✍️ आर्टिकल – धर्मेंद्र कुमार , वैशाली (बिहार)

वाराणसी का मणिकर्णिका घाट केवल एक श्मशान घाट नहीं है, बल्कि यह जीवन और मृत्यु के बीच के रहस्यों को समझने का अनंत प्रतीक भी है। सदियों से यह मान्यता है कि जब चिता शांत हो जाती है और मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूर्ण करता है, तो वह राख पर 94 अंक लिखता है।

लेकिन क्यों लिखा जाता है 94? यह रहस्य बहुतों को ज्ञात नहीं है।

दरअसल, जीवन में 100 शुभ कर्म माने गए हैं। इनमें से 94 कर्म मनुष्य के अधीन होते हैं—जिन्हें वह अपने विवेक, संकल्प और प्रयास से कर सकता है। ये कर्म धर्म, नैतिकता, दान, सेवा, भक्ति और समाजहित से जुड़े होते हैं।
शेष 6 कर्म (हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश) विधि और ईश्वर के अधीन होते हैं। इन पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं है।

इसलिए, जब किसी की चिता शांत होती है, तो मुखाग्नि देने वाला यह संदेश देता है—

> “94 कर्म इस जीवन के साथ भस्म हो गए, और 6 कर्म तुम्हारे साथ अगले जन्म की ओर बढ़ रहे हैं।”

 

भगवद्गीता में भी उल्लेख है कि मृत्यु के बाद मनुष्य का मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ उसके साथ जाती हैं। यही संख्या 6 है। और यही 6 आगे के जीवन का आधार बनती हैं।

अर्थात मृत्यु एक अंत नहीं, बल्कि नए जीवन की शुरुआत है। और मनुष्य को यह याद दिलाने के लिए ही मणिकर्णिका घाट पर 94 लिखने की परम्परा निभाई जाती है।

यह परम्परा हमें सिखाती है कि जीवन रहते हुए हमें उन 94 कर्मों को श्रेष्ठ बनाने की कोशिश करनी चाहिए—क्योंकि मृत्यु के बाद केवल वही हमारे लिए अगली यात्रा का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

विदा यात्री— तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गए, तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।

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