हिंदी दिवस: आत्मसम्मान और पहचान का प्रश्न
लेखक – धर्मेंद्र कुमार , वैशाली
हर वर्ष 14 सितंबर को हम हिंदी दिवस मनाते हैं। यह दिन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि हमारी मातृभाषा हिंदी के महत्व और उसके सम्मान को याद करने का अवसर है। मगर सवाल यह है कि क्या हम वास्तव में हिंदी का सम्मान करते हैं, या फिर सिर्फ दिखावे के लिए इस दिन को मनाते हैं?
आज स्थिति यह है कि जिस देश में हिंदी बोलने और समझने वाले करोड़ों लोग रहते हैं, वहीं हिंदी की पहचान और उपयोगिता को लगातार चुनौती दी जा रही है। गाड़ियों के नंबर प्लेट अगर हिंदी में लिख दिए जाएं तो चालान हो जाता है। सरकारी दफ्तरों और बैंकों में प्रपत्र अंग्रेजी में मिलते हैं, और अधिकांश लोग अंग्रेजी में ही हस्ताक्षर करने को मजबूर हैं। अदालतों में न्याय की बहस और फैसले अक्सर अंग्रेजी में होते हैं, जबकि पीड़ित और वादी-पक्ष हिंदी भाषी होते हैं। यही नहीं, मोबाइल फोन तक में हिंदी भाषा चुनने के लिए हमें ‘Press 2’ करना पड़ता है। यह स्थिति विडंबनापूर्ण है।
हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और हमारी पहचान का आधार है। यह वह धागा है जो देश के कोने-कोने को जोड़ता है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक, हिंदी ने लाखों-करोड़ों लोगों के बीच संवाद और समझ की कड़ी बनाई है।
लेकिन आज हिंदी भाषियों का आत्मविश्वास कमजोर होता जा रहा है। अंग्रेजी बोलना ही “काबिलियत” का पैमाना बन चुका है। लोग अंग्रेजी बोलने पर गर्व महसूस करते हैं, और हिंदी बोलने पर हीनभावना। यह मानसिक गुलामी हमें कहीं न कहीं अपनी जड़ों से काट रही है।
जरूरत है कि हम हिंदी को केवल किताबों, अखबारों और भाषणों तक सीमित न रखें। हिंदी में विज्ञान, तकनीक, न्याय और प्रशासन की पूरी व्यवस्था विकसित होनी चाहिए। यदि चीन, जापान, रूस, जर्मनी जैसे देश अपनी-अपनी भाषाओं में उच्च शिक्षा, न्याय और तकनीकी कार्य कर सकते हैं, तो भारत क्यों नहीं?
हिंदी दिवस का संदेश यही होना चाहिए – हिंदी को केवल भावनाओं की भाषा न समझा जाए, बल्कि इसे रोज़मर्रा के जीवन, शिक्षा और शासन की भाषा बनाया जाए। हमें गर्व होना चाहिए कि हम हिंदी भाषी हैं और हमें अपनी मातृभाषा के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए।
निष्कर्ष:
हिंदी दिवस पर हमें केवल शुभकामनाएं देने के बजाय यह संकल्प लेना चाहिए कि हम हिंदी को उसके वास्तविक सम्मान तक पहुंचाएंगे। यह तभी संभव है जब हर नागरिक अपने दैनिक जीवन में हिंदी का प्रयोग गर्व से करे और समाज में इसे प्रतिष्ठा दिलाने का प्रयास करे। हिंदी का विकास ही भारतीय संस्कृति और आत्मगौरव का विकास है।

