मोहन भागवत का बड़ा बयान: भारत का उद्देश्य शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि विश्व को दिशा देना है
रंगारेड्डी (तेलंगाना), 28 दिसंबर 2025 — राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने तेलंगाना के रंगारेड्डी जिले में आयोजित ‘विश्व संघ शिविर’ के समापन समारोह को संबोधित करते हुए भारत की वैश्विक भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण और व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत का लक्ष्य दुनिया के सामने शक्ति प्रदर्शन करना नहीं है, बल्कि मानवता को सही दिशा और नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करना है।
मोहन भागवत ने कहा कि आज पूरी दुनिया कई स्तरों पर संकट का सामना कर रही है, जिनमें आध्यात्मिक शून्यता, सामाजिक असंतुलन, भौतिकवाद की अति और नैतिक मूल्यों का क्षरण प्रमुख हैं। ऐसे समय में भारत की भूमिका केवल एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे अपने सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सभ्यतागत मूल्यों के माध्यम से विश्व को राह दिखानी चाहिए।
“विश्वगुरु बनना महत्वाकांक्षा नहीं, जिम्मेदारी है”
भागवत ने ‘विश्वगुरु’ की अवधारणा पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि भारत का विश्वगुरु बनना कोई राजनीतिक नारा या सत्ता की महत्वाकांक्षा नहीं है, बल्कि यह एक ऐतिहासिक और नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन सभ्यता ने हमेशा “वसुधैव कुटुम्बकम्” यानी पूरी दुनिया को एक परिवार मानने का संदेश दिया है, और यही सोच आज के वैश्विक तनावों का समाधान बन सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि पिछले सौ वर्षों से भारतीय समाज अपने मूल स्वरूप को पुनः पहचानने की प्रक्रिया में है, और अब समय आ गया है कि यह चेतना वैश्विक स्तर पर मानवता के कल्याण के लिए कार्य करे।
शक्ति नहीं, संतुलन और सद्भाव भारत की पहचान
सरसंघचालक ने जोर देकर कहा कि भारत कभी भी आक्रामक विस्तारवादी सोच का पक्षधर नहीं रहा है। उन्होंने कहा,
“भारत ने कभी भी दूसरों पर अपनी शक्ति थोपने का प्रयास नहीं किया। हमारी परंपरा संतुलन, सह-अस्तित्व और संवाद की रही है।”
भागवत के अनुसार, वास्तविक शक्ति हथियारों या आर्थिक प्रभुत्व में नहीं, बल्कि नैतिक बल, सामाजिक समरसता और सही दिशा देने की क्षमता में होती है।
आधुनिक तकनीक पर भी दी अहम सीख
अपने भाषण के दौरान मोहन भागवत ने आधुनिक तकनीकों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तकनीक स्वयं न तो अच्छी होती है और न ही बुरी, बल्कि उसका उपयोग ही उसका स्वरूप तय करता है।
भागवत ने चेतावनी दी कि यदि तकनीक का उपयोग केवल लाभ, नियंत्रण और प्रभुत्व के लिए किया गया, तो यह मानवता के लिए खतरा बन सकती है। वहीं, यदि इसका उपयोग मानव कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सद्भाव के लिए किया जाए, तो यह दुनिया को बेहतर दिशा दे सकती है।
संघ कार्यकर्ताओं को दिया सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश
विश्व संघ शिविर के समापन अवसर पर भागवत ने संघ कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे समाज में संस्कार, अनुशासन और सेवा भाव को मजबूत करने का कार्य जारी रखें। उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों का काम नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की सहभागिता से ही मजबूत और संतुलित राष्ट्र का निर्माण होता है।
राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों के अनुसार, मोहन भागवत का यह बयान न केवल संघ की विचारधारा को दर्शाता है, बल्कि भारत की वैश्विक भूमिका को नैतिक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत करने का संकेत भी देता है। ऐसे समय में जब विश्व युद्ध, टकराव और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, भारत का यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

